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रस धातु (Ras Dhatu)
दोस्तों आयुर्वेद में सात धातुओं का वर्णन मिलता है, जिन्हें हम सप्त धातु भी कहते हैं। और ये सात धातुओं में सबसे पहली धातु होती है वो हमारी है रस धातु (Ras Dhatu)। जिसे हम नौ अंजलि प्रमाण की मात्रा में मानते हैं। यह शरीर की प्रत्येक कोशिकाओं तक पोषण पहुँचाने का काम करती है। और आज हम इस article में इसी रस धातु (Ras Dhatu) के कार्य, रस वृद्धि के लक्षण, रस क्षय के लक्षण और विभिन्न क्रियाकालों के अनुसार लक्षण रस धातु (Ras Dhatu) के समझेंगे।

शब्द की उत्पत्ति
यह शब्द Sanskrit की ‘रस’ धातु से बना है जिसको हम कह सकते हैं कि बहना या गति करना या प्रवाहित होना। आचार्यों ने इसके बारे में एक श्लोक भी बताया है, अर्थात जो निरंतर गतिशील रहता है वही रस है।
सार्वजनिक संदर्भ में हम ऐसे कह सकते हैं कि रस धातु (Ras Dhatu) वह प्रथम पोषक द्रव्य है जो भोजन के समुचित पाचन के बाद सबसे पहले बनता है। इसे ही आहार रस कहते हैं जो जठराग्नि द्वारा पाचित भोजन का सार भाग है।
रस धातु (Ras Dhatu) का निर्माण
शास्त्रों के अनुसार रस धातु (Ras Dhatu) का निर्माण भोजन ग्रहण करने के लगभग चौबीस घंटे के भीतर हो जाता है। रस धातु (Ras Dhatu) का निर्माण एक जटिल और क्रमबद्ध प्रक्रिया है, जो मुख्यतः तीन चरणों में हम इसे बांटते हैं।
पहला चरण – आहार रस का निर्माण
जब हम भोजन करते हैं तो हमारी जठराग्नि के द्वारा वह भोजन पचता है, और इस पाचन क्रिया से भोजन के दो भाग बनते हैं, एक सार भाग दूसरा किट्ट या अवशिष्ट भाग। जो सार भाग है वही आहार रस कहलाता है, जो अत्यंत सूक्ष्म और द्रव रूप में होता है।
दूसरा चरण – परिसंचरण और शोधन
अब ये जो आहार रस है ग्रहणी से अवशोषित होकर हमारे हृदय तक पहुँचता है, हृदय को रसवह स्रोतस का मूल स्थान भी इसलिए कहा जाता है। अब यहाँ से ये रस व्यान वायु की सहायता से पूरे शरीर में संचालित होता है।
तीसरा चरण – धात्वाग्नि द्वारा परिसंस्करण
जब आहार रस शरीर की कोशिकाओं तक व्यान वायु के द्वारा पहुँचता है तो रस धात्वाग्नि यानी रस धातु (Ras Dhatu) की अग्नि उस पर क्रिया करती है और इस क्रिया के फलस्वरूप दो भाग बनते हैं – पहला स्थायी रस धातु (Ras Dhatu) जो शरीर की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने का काम करती है, दूसरा पोषक अंश जो अगली धातु जैसे रक्त धातु के निर्माण के लिए काम आता है।
धातु पोषण के तीन न्याय सिद्धांत
इस निर्माण प्रक्रिया को समझने के लिए आचार्यों ने तीन महत्वपूर्ण न्याय सिद्धांत दिए हैं जिन्हें हम धातु पोषण न्याय सिद्धांत भी कहते हैं।
पहला – क्षीर दधि न्याय
इस न्याय सिद्धांत के अनुसार जैसे दूध पूर्णतः परिवर्तित होकर दही बन जाता है, वैसे ही आहार रस पूर्ण रूप से रस धातु (Ras Dhatu) में परिवर्तित हो जाती है। यह संपूर्ण परिवर्तन का सिद्धांत है।
दूसरा – खले कपोत न्याय
यानी कबूतर का दाना चुनने का सिद्धांत। यह सिद्धांत हमें बताता है कि प्रत्येक धातु अपनी आवश्यकता के अनुसार आहार रस से पोषक तत्व ग्रहण करती है। ठीक जैसे कबूतर दानों में से अपनी पसंद के दाने चुनता है।
तीसरा – केदारी कुल्या न्याय
इस सिद्धांत के अनुसार जैसे खेतों में नहरों के द्वारा सिंचाई होती है वैसे ही रस धातु (Ras Dhatu) फिर रक्त धातु फिर मांस धातु इस तरह से क्रमबद्ध रूप से धातुओं का पोषण होता है।
Ras Dhatu का मुख्य कार्य – रस तृप्ति और प्रीणन
सबसे पहले बनने वाली धातु है और इसका अंजलि प्रमाण जो हमने पहले भी देखा है कि नौ अंजलि प्रमाण है। इसके प्रमुख मुख्य कार्य शरीर को जीवित और तरोताजा और पुष्ट रखना है फिर भी इसे हम कर्म wise समझते हैं –
प्रीणन – यह शरीर की प्रत्येक कोशिका को द्रव और पोषण प्रदान करके उसे संतुष्टि और ताजगी प्रदान करता है।
जीवन – यह कोशिकाओं की गतिविधि और जीवन क्रियाओं को बनाए रखने का काम भी करता है।
तर्पण – यह त्वचा, श्लेष्मा झिल्ली और अन्य ऊतकों को आर्द्रता और पोषण प्रदान करता है, जिससे त्वचा स्वस्थ और चिकनी बनी रहती है।
धातु पोषण – यह अगली सभी धातुओं जैसे मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र के निर्माण का आधार है। रक्त धातु का उचित निर्माण सीधे रस धातु (Ras Dhatu) की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।
रस धातु (Ras Dhatu) की उपधातु
रस धातु (Ras Dhatu) की दो उपधातु बताई गई हैं – स्तन्य (स्तन का दूध) और आर्तव अर्थात रज (मासिक धर्म द्रव)।
Ras Dhatu की वृद्धि और क्षय के लक्षण -रस धातु (Ras Dhatu) वृद्धि के लक्षण
जब हमारे शरीर में रस की सामान्य से अधिक मात्रा बढ़ जाती है, तो इसके लक्षण बिल्कुल कफ धातु की वृद्धि के समान ही होते हैं, पर ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों में जल तत्व की प्रधानता होती है।
आचार्य सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता सूत्र स्थान अध्याय 15 के अनुसार रस वृद्धि के लक्षण बताए हैं – रस के अधिक बढ़ने पर हृदय में उत्क्लेद, प्रसेक, इसके अतिरिक्त अग्निसाद, आलस्य, गौरव, श्वास, कास, अतिनिद्रा के लक्षण भी हमें देखने को मिलते हैं।
रस धातु (Ras Dhatu) क्षय के लक्षण
रस धातु (Ras Dhatu) के क्षय होने पर शरीर में रूखापन, थकावट और विभिन्न प्रकार की पीड़ा उत्पन्न हमें देखने को मिलती है।
सुश्रुत संहिता (सूत्र स्थान 15/13) –
रसक्षये हृत्पीडा कम्पः शोषः शून्यता तृष्णा च।
अर्थात रस धातु (Ras Dhatu) के क्षय होने पर हृदय में पीड़ा, कंपन, शोष, शून्यता और तृष्णा के लक्षण उत्पन्न होते हैं।
अब जैसा कि हमने तृष्णा का विशेष वर्णन देखा है, तो तृष्णा के बारे में सुश्रुत ने उत्तर तंत्र में इसका लक्षण बताया है –
पुनः पुनर्जलं पीत्वा पुनस्तृष्यति चाधिकम्।
अतृप्तोऽपि जलं यो हि तां तृष्णां निर्दिशेद् बुधः॥
अर्थात जो व्यक्ति बार-बार पानी पीता है परंतु उसे तृप्ति नहीं होती और वह पुनः पानी की कामना करता है, इस अवस्था को तृष्णा कहते हैं और ये रस क्षय का सबसे महत्वपूर्ण लक्षणों में से एक है।
रस धातु (Ras Dhatu) का स्थान और परिसंचरण तंत्र
दोस्तों रस धातु (Ras Dhatu) का जो मुख्य स्थान होता है वो हृदय होता है, और इस बारे में चरक संहिता में भी बताया गया है, अर्थात हृदय रसवाही नाड़ियों का मूल स्थान है।
यह सिद्धांत आधुनिक चिकित्सा में रक्त परिसंचरण तंत्र से काफी मेल खाता है। और जो हृदय से व्यान वायु है वही रस धातु (Ras Dhatu) को पूरे शरीर में संचरण का काम करती है और ये लाइन हमने ऊपर भी देखी थी।
रस धातु (Ras Dhatu) का मल
रस धातु (Ras Dhatu) का जो मुख्य मल है वो कफ है। जब रस धातु (Ras Dhatu) सामान्य अवस्था में होती है तो यही कफ हमारे शरीर में अंगों को स्नेहन का काम करता है, सुरक्षा प्रदान करता है और बल का काम करता है।
और अगर रस की वृद्धि के कारण कफ अगर बढ़ा तो ये विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न करेगा।
रस धातु (Ras Dhatu) के स्वास्थ्य हेतु आहार-विहार
रस धातु (Ras Dhatu) का सही निर्माण तभी संभव होगा जब हमारी पाचन अग्नि यानी जठराग्नि स्वस्थ हो और इसके लिए आयुर्वेद में कुछ विशेष निर्देश भी दिए गए हैं जिन्हें हम निम्न प्रकार से समझेंगे।
रस धातु (Ras Dhatu) को बढ़ाने वाला आहार
मधुर रस प्रधान आहार – गेहूं, चावल, दूध, घी, खजूर, अंजीर
नया अन्न (नवान्न)
दालों का पानी (सूप)
ताजे फल
पर्याप्त जल
रस धातु (Ras Dhatu) को नुकसान पहुँचाने वाले कारक
अत्यधिक रूखा, चटपटा, कड़वा भोजन करना
अजीर्ण होने पर भोजन करना
बहुत तेज अम्लीय या कसैला आहार का सेवन करना
अत्यधिक उपवास या भूखा रहना
रात्रि जागरण, दिन में अधिक सोना
अत्यधिक मानसिक तनाव या भय होना
रसवह स्रोतस दुष्टि के लक्षण
जब रसवह स्रोतस दूषित होता है तो रस धातु (Ras Dhatu) को ले जाने वाली नाड़ियाँ भी दूषित हो जाती हैं।
अगर ऐसा हो जाता है तो हमें कुछ लक्षण दिखाई देते हैं जैसे अश्रद्धा, अरुचि, आस्य वैरस्य, अरसज्ञता, हृल्लास, गौरव, तन्द्रा, अंगमर्द, ज्वर, तम, पाण्डुता, स्रोतसां रोध, क्लैब्य, साद, कृशांगता, नाशोऽग्नेः, अकाल पलित और वली।
ये सब हमें रसवह स्रोतस के दूषित होने पर लक्षण दिखाई देते हैं। अगर ये लक्षण दिख जाते हैं तो इससे ये समझना चाहिए कि रसवह स्रोतस अब दूषित हो गया है और हमें इलाज की जरूरत पड़ेगी।
- परीक्षा की दृष्टि से FAQ
विधिपूर्वक सेवन किया हुआ आहार जब पाक होकर प्रसाद रूप में अत्यंत सूक्ष्म सार बन जाता है, उसे रस कहते हैं। - रस 9 अंजलि प्रमाण,
- अन्न के पाचन के पश्चात अन्न दो भागों में बंट जाता है, पहला किट्ट भाग, दूसरा प्रसाद भाग जो धातुओं का पोषण करता है,
- रस तृप्ति एवं प्रसन्नता, शरीर का तर्पण एवं रक्त की पुष्टि करने का काम करता है,
रस जिसका मुख्यतः प्रीणन करने का कर्म है। - रस धातु का माल क्या है सही उत्तर का प्रमुख व्याख्या रस धातु का कफ़ मल बताया गया है वही रक्त धातु का मल पित है
- रस के गुण – द्रव, सर, मंद, स्निग्ध, गुरु, शीत हैं।
- रस धातु के उपधातु – स्तन्य और आर्तव हैं।
- रसवह स्रोतस का मूल – चरक के अनुसार हृदय और दश धमनी / सुश्रुत के अनुसार हृदय और रसवाही धमनी।
- रसवह स्रोतस दुष्टि के कारण – गुरु, शीत, अतिस्निग्ध भोजन और चिंता।
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पित्त दोष (Pita Dosh): लक्षण, कारण, उपचार और आयुर्वेदिक जानकारी
आयुर्वेद में धातुओं के बारे में विस्तार से जानने के लिए [Wikipedia पर सप्त धातु]
Rakta Dhatu in Ayurveda: Formation, Functions, Vitiation and Treatment
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✍️ Lekhak: Ayurved Study Hub Research Team
Rajasthan se, 6+ saal ka Ayurved field research anubhav. 150+ jadi-bootiyon ki swayam pehchan.
📖 Reference: Charak Samhita, Bhavprakash Nighantu
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