पित्त दोष (Pita Dosh): लक्षण, कारण, उपचार और आयुर्वेदिक जानकारी

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आयुर्वेद में वात, पित्त(Pita Dosh) और कफ तीनों दोष शरीर की सामान्य क्रियाओं को संतुलित बनाए रखते हैं। अगर इन तीनों में से किसी एक में भी विकृति आती है, तो व्याधियों की उत्पत्ति होने लग जाती है। आज के हमारे इस आर्टिकल में हम पित्त दोष के बारे में जानकारी अच्छे तरीके से समझेंगे।

जब पित्त अपनी सामान्य अवस्था में रहता है, तब शरीर की विभिन्न क्रियाएँ उचित रूप से चलती हैं। लेकिन जब पित्त में विकृति आती है या उसकी मात्रा सामान्य सीमा से कम या अधिक हो जाती है, तो शरीर में विभिन्न प्रकार के व्याधियों के लक्षण दिखाई देने लग जाते हैं।

पित्त दोष क्या है

आयुर्वेद में दोषों की तीन अवस्थाएँ बताई गई हैं। पहली है सम अवस्था, दूसरी है वृद्धि अवस्था और तीसरी है क्षय अवस्था। यानी हम चलो इसे एक आसान उदाहरण से समझते हैं कि दोष की वृद्धि होने पर उसके सामान्य कार्य हमें अधिक दिखाई देने लग जाते हैं और दोष के क्षय होने पर सामान्य कार्यों में कमी या उसके उल्टे अथवा विपरीत गुण हमें दिखाई देने लग जाते हैं।

पित्त दोष क्या है?

हमने पिछले आर्टिकल में वात दोष के बारे में समझ लिया था और उसके MCQs के बारे में भी समझ लिया था। अगर आपने वह आर्टिकल नहीं पढ़ा है, तो आप उसे जाकर देख सकते हैं।

पित्त दोष मुख्य रूप से अग्नि  महाभूत प्रधान माना गया है। पित्त शरीर में परिवर्तन और रूपांतरण की प्रक्रियाओं से जुड़ा हुआ है। विशेष रूप से भोजन के पाचन और शरीर में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

पित्त दोष के प्रमुख गुण

पित्त दोष के प्रमुख गुण

आयुर्वेद में पित्त के सात प्रमुख गुण बताए गए हैं। वैसे विभिन्न आचार्यों ने पित्त के गुणों का अलग-अलग प्रकार से वर्णन किया है, लेकिन सामान्य रूप से पित्त के सात प्रमुख गुण इस प्रकार हैं—

सस्नेह, तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, विस्र, सर और द्रव।

इसका मतलब ये हुआ कि कि इन गुणों के कारण ही पित्त में उष्णता, तीक्ष्णता, द्रवता और परिवर्तनकारी क्रियाएँ लक्षण बनने लगते हैं। यही कारण है कि पित्त बढ़ने पर शरीर में गर्मी, जलन, तीक्ष्णता, पाचन में अत्यधिक सक्रियता और पीतवर्ण जैसे लक्षण हमें स्पष्ट रूप से दिखाई देने लग जाते हैं।

पित्त दोष के प्रमुख कार्य

विभिन्न आचार्यों ने पित्त दोष के अलग-अलग कार्यों को बताया है, लेकिन ऑलमोस्ट हम इस तरह से कह सकते हैं कि सभी का मोटिव एक ही था और उन सभी को बाय डिफॉल्ट के रूप में हम पित्त के प्रमुख कार्यों को इस आर्टिकल में देखेंगे।

1. पाचन

भोजन के पाचन में पित्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पाचन प्रक्रिया ठीक रहने पर भोजन से शरीर को आवश्यक पोषण प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

2. चयापचय

शरीर में विभिन्न पदार्थों के परिवर्तन और उपयोग की प्रक्रिया में पित्त अपनी भूमिका निभाता है।

3. शरीर में उष्णता

पित्त अपने गुण-कर्म के द्वारा शरीर में गर्मी और उष्णता बनाए रखता है।

4. वर्ण और प्रभा

आयुर्वेद में त्वचा के वर्ण और शरीर की प्राकृतिक प्रभा के साथ भी पित्त का संबंध है, क्योंकि पित्त के अंदर उष्णता का गुण है। उष्णता शरीर में तेज को बनाए रखती है।

5. इन्द्रिय संबंधी कार्य

पित्त के संतुलन का संबंध इन्द्रियों की सामान्य कार्यक्षमता से भी माना जाता है। पित्त की वृद्धि में इन्द्रिय-दौर्बल्य देखने को मिलता है।

पित्त दोष की वृद्धि क्यों होती है?

वैसे किसी भी दोष की वृद्धि होने में महत्वपूर्ण कारण समान गुणों के सेवन से संबंधित ही है। अगर हम पित्त को बढ़ाने वाले आहार, जैसे उष्ण आहार का सेवन करेंगे, तो पित्त बढ़ेगा और उसके विपरीत गुणों का हम सेवन करेंगे, जैसे ठंडी चीजों का सेवन करेंगे, तो पित्त घटेगा।

इनको हम निम्न बिंदुओं से समझ सकते हैं।

अत्यधिक पित्त बढ़ने के प्रमुख बिंदु

– अत्यधिक तीखा भोजन करना

– अत्यधिक खट्टा भोजन करना

– नमकीन भोजन करना

– बहुत अधिक गरम भोजन करना

– विदाही आहार-विहार

– अत्यधिक मसालेदार भोजन

– शरीर में अधिक गर्मी के संपर्क में आना

– अत्यधिक क्रोध करना

– अनियमित खान-पान होना

– अत्यधिक उपवास करना

– अत्यधिक शारीरिक परिश्रम आदि करना

– गरम वातावरण में अधिक समय तक रहना

इन सब के कारण शरीर में पित्त की वृद्धि देखने को मिलती है।

शरीर में पित्त दोष की वृद्धि होने पर क्या लक्षण दिखाई देते हैं?

जैसा कि हम पहले भी ये बात बता चुके हैं कि जब हम पित्त से संबंधित आहार-विहार का अधिक मात्रा में सेवन करेंगे तो पित्त दोष की वृद्धि होती है। तो इस वृद्धि के बारे में सुश्रुत संहिता के सूत्रस्थान अध्याय 15 के अंदर पित्त वृद्धि के लक्षणों का हमें स्पष्ट वर्णन मिलता है, जैसे कि उन्होंने सुश्रुत संहिता में बताया है कि पित्त उपास्ता, संताप, शीत की इच्छा, नींद का मानना, मूर्छा होना, बल हानि, इंद्रियों में दुर्बल्य होना तथा पित्त वर्धन का ये अपने मल, मूत्र और आँखें होना आदि लक्षण होते हैं।

पीतावभासता संतापः शीतकामित्वमल्पनिद्रता।

मूर्च्छा बलहानिरिइन्द्रियदौर्बल्यं पीतविण्मूत्रनेत्रता॥

– सु.सू. 15/17

वैसे इनको हम दूसरे तरीके से भी हम समझ सकते हैं।

एक नंबर शरीर में गर्मी बढ़ना।

अगर हमारे शरीर में पित्त की वृद्धि होगी तो इससे हमें शरीर में गर्मी का अनुभव होगा।

दो नंबर—जलन।

पित्त की उष्ण प्रकृति होने के कारण हमें दाह या जलन की अनुभूति होगी।

तीन नंबर—ठंडी चीजों की इच्छा।

पित्त वृद्धि व्यक्ति जो होता है उसे हमेशा ठंडी चीजें अच्छी लगती हैं और विशेषकर जब पित्त बढ़ता है तो हमें ठंडे वातावरण और शीतल पेय पदार्थ पीने की इच्छा होगी।

चार नंबर—पीला वर्ण।

पित्त की वृद्धि होने पर हमारा त्वचा, आँखें ये पीले दिखाई देंगे।

पाँच नंबर—मल-मूत्र का पीला होना।

पित्त की वृद्धि हो जाने पर मल, मूत्र ये पीले हो जाएंगे। ये जैसा कि हमने अभी सुश्रुत संहिता के सूत्रस्थान 15 के बारे में हमने डिस्कस किया था।

छह नंबर—नींद में कमी।

पित्त की वृद्धि में अल्प निद्रता अर्थात सामान्य से कम नींद आएगी।

सात नंबर—बल में कमी।

पित्त की वृद्धि होने पर बल हानि हमें महसूस होने लगता है।

आठ नंबर— और बाकी इंद्रियों में दुर्बल्य और मूर्छा, अधिक भूख और प्यास लगना, मुँह का स्वाद कड़वा हो जाना, चिड़चिड़ा या क्रोध होना, ये भी पित्त की वृद्धि होने पर लक्षण दिखाई देते हैं।

अगर पित्त दोष कम हो जाए तो क्या लक्षण दिखाई देंगे?

ज़रूरी नहीं है कि पित्त की वृद्धि हो। कई बार पित्त वर्धक आहार-विहार हम कम खाएँ या बिल्कुल भी नहीं खाएँ तो हो सकता है पित्त शांत भी हो जाए। सबसे अच्छी सही स्थिति तो वही होती है कि दोष सामान्य होने चाहिए। लेकिन अगर पित्त का शमन हो जाएगा तो क्या लक्षण दिखाई देंगे?

पहला—मंद अग्नि।

पित्त कम होने पर पाचन शक्ति कमजोर होने की प्रवृत्ति बताई गई है।

दूसरा—शरीर में ठंडापन।

पित्त की ऊष्णता कम होने के कारण शीतता या ठंडापन हमें महसूस होगा।

तीसरा— त्वचा की प्रभा कम होना यानी शरीर में जो हमारी चमक है चेहरे की, वो मुरझाई-मुरझाई-सी लगेगी।

चार नंबर—अरुचि।

भोजन के प्रति हमें रुचि नहीं रहेगी पित्त के जब शमन होगा तो।

पाँच नंबर—शरीर में रुखसता।

अंगों में पारुषता या रुखसता दिखाई देगी।

छह नंबर—आँखों और नाखूनों में श्वेतता।

पित्त का जब शमन होगा तो नाखूनों और आँखों में श्वेतता का वर्णन मिलेगा। ये सब चरक संहिता में इनका वर्णन मिलता है। और दूसरी बात ये जितने भी लक्षण हैं, पित्त वृद्धि से विपरीत हैं।

पित्त दोष के प्रकार

पित्त दोष मुख्यतः पाँच प्रकार का माना गया है, जिस तरह से वात दोष पाँच होते हैं, उसी तरह पित्त दोष भी पाँच होते हैं।

एक नंबर—भ्राजक पित्त।

भ्राजक पित्त त्वचा में रहने वाला है।

दो नंबर—साधक पित्त।

यह पित्त हृदय  का मुख्य स्थान है

तीन नंबर—आलोचक पित्त।

आलोचक पित्त आँख  में वहाँ रहता है

चार नंबर—पाचक पित्त।

पाचक पित्त भोजन के पाचन में काम करता है और यह आमाशय व पक्वाशय के मध्य में रहता है।

5-रंजक पित्त।

रंजक पित्त रक्त के निर्माण में काम करता है, तो यह यकृत व प्लीहा में रहता है।

एक इम्पोर्टेंट पॉइंट अगर आपके शरीर में पित्त वृद्धि के लक्षण दिखाई देते हैं, तो इसका मतलब ऐसा भी नहीं है कि पित्त की वृद्धि हो रही है। कई बार दूसरे कारण भी हो सकते हैं शरीर के पीलापन होने में, तो इसलिए हमें चिकित्सक की सलाह ज़रूर लेनी चाहिए। बिना चिकित्सक की सलाह से हम खुद इस नतीजे पर नहीं पहुँचना चाहिए कि पित्त की वृद्धि ही हो रही है।

पित्त का संचय वर्ष ऋतु में, पित्त का प्रकोप शरद ऋतु में और पित्त का शमन काल हेमंत ऋतु में होता है। पित्त सात्त्विक गुण प्रधान है।

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कफ दोष क्या है? Kapha Dosh Ke Gun, Karan Aur Lakshan – पूरी जानकारी

वात दोष(vata dosh) के 39 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर | आयुर्वेद परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण प्रश्न

Most Important One-Liner Question Answer Pita Dosh

Most Important One-Liner Question Answer Pita Dosh
प्रश्न क्रमांकप्रश्न और उत्तर
11. पित्त दोष का प्रधान महत्त्व कौन-सा है?उत्तर: अग्नि महाभूत प्रधान
22. पित्त दोष का मुख्य स्थान शरीर में कहाँ पर है?सही उत्तर: नाभि।
33. अष्टांग हृदय के अनुसार पित्त के गुण कितने हैं?उत्तर: 7प्रमुख व्याख्या: अष्टांग हृदय ने सस्नेह–तीक्ष्ण–उष्ण–लघु–विस्र–सर–द्रव। ये पित्त के गुण बताए हैं।
44. पाचक पित्त का स्थान क्या है?उत्तर: पाचक पित्त का स्थान आमाशय व पक्वाशय के मध्य ग्रहणी में है।
55. रंजक पित्त का स्थान कहाँ है?उत्तर: यकृत व प्लीहा में।
66. साधक पित्त का स्थान कहाँ है?उत्तर: हृदय में।
77. आलोचक पित्त का स्थान कहाँ है?उत्तर: नेत्र में।
8भ्राजक पित्त का स्थान कहाँ पर है?उत्तर: त्वचा में।
9पित्त का प्रकोप काल कौन-सा है?उत्तर: पित्त का प्रकोप काल शरद ऋतु है।
10 पित्त का संचय काल कौन-सा है?उत्तर: पित्त का संचय काल वर्षा ऋतु में होता है।प्रमुख व्याख्या: पित्त का संचय वर्षा ऋतु में होता है, पित्त का प्रकोप शरद ऋतु में होता है, ये आचार्य चरक के अनुसार है।
1111. पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति का शरीर किस प्रकार का होता है?सही उत्तर: मध्यम प्रकृति।अष्टांग हृदय में प्रकृति को हीन/मध्य/उत्तम के संदर्भ में वर्णित किया गया है, जिसमें पित्त को मध्य कहा गया है।
1212. पित्त दोष का कार्य क्या है?उत्तर: पित्त दोष का प्रमुख कार्य पाचन, ऊष्मा और दर्शन है।
1313. पित्त वृद्धि के लक्षण क्या हैं?उत्तर: पीत नेत्र, दाह और तृष्णा।
1414. पित्त क्षय के लक्षण क्या हैं?उत्तर: अग्निमांद्य और स्नायुशैथिल्य।
1515. पित्त को शांत करने वाले रस कौन से हैं?उत्तर: मधुर, तिक्त, कषाय।
1616. पित्त को बढ़ाने वाले रस कौन से हैं?सही उत्तर: अम्ल, लवण, कटु।
1717. पित्त दोष में कौन सा रोग होता है?सही उत्तर: B — अम्लपित्त, रक्तपित्त, कामला।
1818. पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति को पसीना कैसा आता है?अत्यधिक और दुर्गंधयुक्त।
1919. भ्राजक पित्त का कार्य क्या है?त्वचा के वर्ण और कांति को धारण करना।
2020. साधक पित्त का कार्य क्या है?मेधा, बुद्धि और अभिमान को साधना।
2121. पाचक पित्त को आयुर्वेद में क्या कहा गया है?सही उत्तर: जठराग्नि।
2222. पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति को कौन सा मौसम सहन नहीं होता?सही उत्तर: ग्रीष्म मौसम।
2323. पित्त शामक आहार कौन सा है?सही उत्तर: घी, नारियल पानी, खरबूजा, धनिया।
2424. पित्त दोष का संबंध किस अवस्था से है?मध्यम अवस्था या युवा अवस्था से।
2525. पित्त का मल क्या होता है?पित्त का मल होता है स्वेद और रक्त।
2626. आलोकचक पित्त किस इंद्रिय से संबंधित है?चक्षु इंद्रिय से।
2727. पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति की अग्नि कैसी होती है?सही उत्तर: तीक्ष्ण या तीक्ष्णाग्नि।
2828. चरक के अनुसार पित्त दोष का प्रमुख कर्म क्या है?पाक।
2929. पित्त दोष को सम्यवस्था में क्या कहते हैं?सही उत्तर: समपित्त।
3030. पित्त दोष के लिए श्रेष्ठ चिकित्सा क्या है?सही उत्तर: विरेचन।
Disclaimer: यह लेख केवल जानकारी हेतु है। किसी भी औषधि का सेवन करने से पहले अपने आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लें।

✍️ Lekhak: Ayurved Study Hub Research Team
Rajasthan se, 6+ saal ka Ayurved field research anubhav. 150+ jadi-bootiyon ki swayam pehchan.

📖 Reference: Charak Samhita, Bhavprakash Nighantu
⚠️ Disclaimer: Yah lekh keval shiksha ke liye hai. Kisi bhi aushadhi ka sevan karne se pehle apne Vaidya se paramarsh jarur le.

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