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परिचय
आयुर्वेद में शरीर को पंच महाभूतों के अलावा सात धातुओं से भी निर्मित माना गया है, जैसे रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र।
इनमें से हम ये कह सकते हैं कि Rakta Dhatu का स्थान महत्वपूर्ण और दूसरा है। परंतु इसका महत्व अधिक क्यों है? क्योंकि यह जीवन का आधार है।
आचार्य चरक ने भी कहा, “देहस्य रक्तं मूलत्वात”, और सुश्रुत ने रक्त को साक्षात् प्राण कहा। रक्त के बिना जिंदगी संभव नहीं है।
अब इस बारे में आचार्यों ने इसे चतुर्थ दोष भी कहा। अब चतुर्थ दोष क्यों कहा? क्योंकि रक्त जो है, स्वतंत्र रूप से रोग उत्पन्न करता है और इसका वर्णन चरक सूत्रस्थान 24 और सुश्रुत सूत्रस्थान 14 में मिलता है।

रक्त धातु की परिभाषा और पर्याय
रक्त धातु की परिभाषा: जो रंजक पित्त के द्वारा रंजित होता है, वह रक्त कहलाता है।
बृहत्रयी, जिसमें चरक, सुश्रुत और वाग्भट आते हैं, उन्होंने रक्त धातु के कुछ पर्याय बताए हैं, विशेषकर रक्त के, जैसे रुधिर, लोहित, अस्रक, अस्र, रुधिर, शोणित आदि।
रक्त धातु(Rakta Dhatu) के उत्पत्ति-
रक्त धातु की उत्पत्ति: जिस तरह से क्रमशः धातुओं की उत्पत्ति होती है, तो रस से रक्त की उत्पत्ति होती है। परंतु तीनों आचार्यों का मत भी एक ही है।
जैसे हम बात करें चरक चिकित्सा स्थान 15/16, जिसमें एक सूत्र है—
“रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदस्ततोऽस्थि च।
अस्थ्नो मज्जा ततः शुक्रं शुक्राद्गर्भः प्रसादजः॥”
जब आहार का रस ग्रहणी और जब हमारे आमाशय में पचकर रस धातु बनता है, तब वह रस हमारे लिवर और प्लीहा में जाता है। वहाँ रंजक पित्त द्वारा उसका रंजन होता है और वह लाल रंग का रक्त बन जाता है।
इसी तरह सुश्रुत सूत्रस्थान 14/4–5, शोणितवर्णनीय अध्याय में इसका भी स्पष्टीकरण मिलता है।
“स खल्वाप्यो रसो यकृत्प्लीहानौ प्राप्य रागमुपैति॥”
और इसके बाद श्लोक में कहा गया है—
“रञ्जितास्तेजसा त्वापः शरीरस्थेन देहिनाम्।
अव्यापन्नाः प्रसन्नेन रक्तमित्यभिधीयते॥”
अर्थात् आचार्य सुश्रुत ने कहा कि जब रक्त का रस यकृत और प्लीहा में पहुँचता है, तब वहाँ स्थित रंजक पित्त से वह लाल हो जाता है। इस प्रक्रिया में तेज महाभूत की अधिकता होती है।
दोस्तों, ये समझने वाली बात है, रक्त का महाभूत तेज होता है, ये भी आचार्य सुश्रुत ने कहा।
चरक चिकित्सा स्थान 15/28 में भी इसी प्रक्रिया का स्पष्टीकरण मिलता है—
“तेजो रसानां सर्वेषां मनुजानां यदुच्यते।
पित्तोष्मणः स रागेण रसो रक्तत्वमृच्छति॥”
अर्थात् पित्त की उष्णता और उसके रंजन के कारण रस रक्तता को प्राप्त करता है।
वाग्भट के अनुसार अष्टांग हृदय में भी इसी मत का समर्थन किया गया है। उन्होंने कहा कि रस धातु के स्नेह, उष्ण, तीक्ष्ण गुण पित्त के सहयोग से रक्त बनता है।
रक्त धातु(Rakta Dhatu) के स्थान एवं परिमाण
आचार्य ने Rakta Dhatu का मुख्यतः स्थान एक ही बताया है—यकृत और प्लीहा। और इसका जो परिमाण है, वो आठ अंजलि है। लेकिन फिर भी हम विभिन्न आचार्यों के श्लोक और उनके स्थान और उन्होंने कितना परिमाण माना है, वो हम एक-एक क्रम से समझेंगे।
चरक संहिता के अनुसार: चरक विमान स्थान 5/8 के अनुसार—
“शोणितवहानां स्रोतसां यकृन्मूलं प्लीहा च।”
अर्थात् चरक ने कहा कि रक्तवह स्रोतस का मूल यकृत और प्लीहा है।
परिमाण की बात करें तो: चरक ने शारीर स्थान 7/15 के अनुसार शरीर में रक्त का जो परिमाण है, वो आठ अंजलि है।
वाग्भट के अनुसार भी रक्त का परिमाण आठ अंजलि माना गया है।
सुश्रुत शारीर स्थान 7 में अंग-प्रत्यंग में भी रक्त की मात्रा का हमें वर्णन क्रम से मिलता है।
रक्त धातु(Rakta Dhatu) के गुण कर्म –
चरक संहिता के सूत्रस्थान 24 के अनुसार रक्त के कुछ गुण हैं, श्लोक के माध्यम से, जिन्हें हम समझेंगे।
“अनुष्णशीतं मधुरं स्निग्धं रक्तं च वर्णतः।”
अर्थात् आचार्य चरक ने कहा, रक्त जो है, न अत्युष्ण, न अत्यशीत, यानी न अधिक गरम, न अधिक ठंडा, मधुर, स्निग्ध, गुरु, द्रव और मृदु।
और पंच महाभौतिक संगठन की बात करें तो रक्त में पृथ्वी, आप और तेज महाभूत की अधिकता होती है, लेकिन विशेषकर अग्नि महाभूत से लाल रंग इसमें आता है।
कर्म-अगर हम रक्त के कर्म की बात करें तो रक्त के कर्म के संदर्भ में जीवन धारण, मांस पुष्टि, वर्ण प्रसादन और इंद्रिय तर्पण का वर्णन मिलता है।
यानी हम ये कह सकते हैं कि सबसे महत्वपूर्ण कर्म जो है, वो जीवन का धारण है और मांस धातु की पुष्टि करना, त्वचा के वर्ण को उज्ज्वल बनाना और इंद्रियों को तृप्त करना, ये सब Rakta Dhatu के कर्म हैं।
अब हम बात करते हैं सुश्रुत संहिता के सूत्रस्थान 14/44 में—
“देहस्य रुधिरं मूलं रुधिरेणैव धार्यते।
तस्माद्यत्नेन संरक्ष्यं रक्तं जीव इति स्थितिः॥”
सुश्रुत ने रक्त के विशेष महत्व को बताया है। पहला, देह का मूल रक्त है और दूसरा, रक्त से ही शरीर धारण किया जाता है। इसलिए रक्त की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि रक्त ही जीवन है।
आचार्य वाग्भट के अष्टांग हृदय, सूत्रस्थान 11/4 के अनुसार—
“प्रीणनं जीवनं लेपः स्नेहो धारणपूरणे।
गर्भोत्पादश्च धातूनां श्रेष्ठं कर्म क्रमात् स्मृतम्॥”
अर्थात् धातुओं के श्रेष्ठ कर्म क्रमशः प्रीणन, जीवन, लेप, स्नेह, धारण-पूरण और गर्भोत्पादन बताए गए हैं।
शुद्ध रक्त के लक्षण –
दोस्तों, दूषित रक्त के बारे में तो हम बहुत जगह पढ़ भी लेते हैं, समझ भी लेते हैं, लेकिन सबसे पहले हमें यह समझना है कि एक शुद्ध रक्त होता कैसा है। हमारी संहिताओं में शुद्ध रक्त के बारे में क्या-क्या लिखा है, उसके बारे में हम समझेंगे।
- सुश्रुत संहिता के सूत्रस्थान 14/44 — “तप्तकाञ्चनसन्निभं पद्मालक्तकसन्निभं। गुंजाफलसवर्णं च विशुद्धं विद्धि शोणितम्।” अर्थात तपाए हुए सोने के समान, कमल फूल के समान, गुंजा फल के समान लाल रंग का जो रक्त है, वही शुद्ध है।
- चरक संहिता के सूत्रस्थान 24/22 में शुद्ध रक्त का वर्ण तपाए हुए सोने, इंद्रगोप, लाल कमल, लाख के रस और गुंजा फल के समान बताया गया है।
- वाग्भट अष्टांग हृदय के सूत्रस्थान 27/1 के अनुसार शुद्ध रक्त थोड़ा मधुर और लवण रस वाला, न अधिक उष्ण न अधिक शीत और असंहत होता है। इसका वर्ण कमल, इंद्रगोप, हेम और खरगोश के रक्त के समान बताया गया है।
रक्तसार पुरुष के लक्षण –
आचार्य चरक ने रक्तसार पुरुष के कुछ लक्षण बताए हैं, जो इकलौते ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने इस बारे में वर्णन किया है। इन्होंने चरक संहिता के विमान स्थान 8/104 में रक्तसार पुरुष की परिभाषा दी है। यानी जिस व्यक्ति में रक्त धातु उत्तम मात्रा में हो, उसे रक्तसार पुरुष कहते हैं।
“कर्णाक्षिमुखजिह्वानासौष्ठपाणिपादतलनखललाटमेहनं स्निग्धरक्तवर्णं श्रीमद्भ्राजिष्णु रक्तसाराणाम्।”
यानी कान, आँख, मुख, जिव्हा, नाक, होठ, हथेली, पादतल, नख, ललाट, मेहन, ये सब स्निग्ध और लाल रंग के होते हैं, किसमें? रक्तसार पुरुष में। और ऐसे व्यक्ति सुख, मेधा, ऐश्वर्य, बल, उत्साह से परिपूर्ण होता है। रक्तसार पुरुष गर्मी सहन नहीं कर पाता है और ऐसे लोग सुखी और बुद्धिमान होते हैं।
रक्त धातु(Rakta Dhatu) दोष के कारण –

आचार्य चरक ने चरक सूत्र स्थान 24/5-10 में कहा, क्रोध, भय, शोक, उपवास, विदग्ध अन्नपान, शरद ऋतु, दिवा स्वप्न। उनके अनुसार आहारज, विहारज, मानसिक और कालज, ये चार तरह के कारणों से रक्त धातु में दुष्टि होती है।
- आहारज में क्या आते हैं? कटु, अम्ल, लवण, क्षार, उष्ण, तीक्ष्ण, विदाही अन्नपान का अगर अति सेवन करता है आदमी और तिल-तेल, कुलथ, माष, निष्पाव, शराब का अधिक सेवन करता है, तो रक्त धातु में दुष्टि होना वाजिब है।
- विहारज: धूप में अधिक घूमना, अग्नि के सामने ज्यादा देर तक बैठे रहना, चोट लगना या वेग धारण से भी रक्त धातु में दुष्टि होती है।
- मानसिक: क्रोध, शोक, भय, इन कारणों से भी रक्त धातु में दुष्टि देखने को मिलती है।
- चौथा, कालज: शरद ऋतु में पित्त के प्रकोप से रक्त धातु का भी प्रकोप माना गया है।
सुश्रुत सूत्र 24/9 और वाग्भट के अष्टांग हृदय सूत्र 27 में भी लगभग ये सेम ही कारण बताए गए हैं।
रक्त वृद्धि और रक्त क्षय के लक्षण –
दोस्तों, जब हमारे शरीर में रक्त धातु की वृद्धि हो जाती है तो हमें क्या लक्षण देखने को मिलते हैं और अगर रक्त धातु की कमी हो जाती है तो हम उसमें क्या लक्षण देखते हैं। हमारी संहिताओं में भी इनके लक्षणों के वर्णन हैं, उन्हीं के आधार पर हम ये सब कर रहे हैं।
A. रक्त वृद्धि के लक्षण-
- सुश्रुत संहिता के सूत्रस्थान 15/16 में “रक्तं रक्ताक्षिता शिरापूर्णत्वं च”। अर्थात शरीर और आँखों का लाल हो जाना, शिराओं का फूल जाना या भरा हुआ लगना। और वाग्भट ने सूत्रस्थान 11/8 में इसमें विसर्प, क्लैब्य, वृद्धि, कुष्ठ, वातरक्त को भी अलग से जोड़ा है।
B. रक्त क्षय के लक्षण –
- सुश्रुत सूत्र 15/16 में “रूक्षता त्वक्पारुष्यं शिराशैथिल्यम्”। जब रक्त धातु का क्षय होता है तो त्वचा रूखी हो जाएगी, त्वचा फटने या खुरदरी हो जाएगी, अम्ल, शीतल प्रार्थना होगी, खट्टी और ठंडी चीजों की खाने की इच्छा होगी, शिराएँ ढीली पड़ जाएँगी। इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं, शिरा शैथिल्य।
रक्त प्रदूषज विकार, रक्तज रोग –
ये सबसे महत्वपूर्ण विषय है Rakta Dhatu के अंदर, क्योंकि चरक सूत्र 24/11-16 और सुश्रुत सूत्र 24/9 और वाग्भट सूत्र 27 में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
- मुखपाक, अक्षिपाक, घ्राणपाक, अश्यपाक, गुल्म, उपकुष्ठ, विसर्प, रक्तपित्त, प्रमीलक, विद्रधि, रक्तमेह। आचार्यों ने लगभग साठ से अधिक रोगों को रक्त प्रदूषज माना है, यानी प्रधान रोग।
- त्वचा विकार—कुष्ठ, विसर्प, पीडिका, नीलिका, कामला और व्यंग।
- मुख रोग में मुखपाक, उपकुष्ठ, जिसमें मसूड़ों से खून आना भी है, नेत्र रोग, रक्तज अभिष्यंद, अक्षिपाक, रक्तपित्त, नाक, मुँह, गुदा से रक्तस्राव, वातरक्त, जोड़ों में दर्द और सूजन।
- गुल्म, विद्रधि, अर्श।
सुश्रुत ने भी कहा है कि पित्त के स्थान में रहने वाले सभी रोग रक्त के दूषित होने से होते हैं, क्योंकि पित्त और रक्त का आश्रय-आश्रयी संबंध है।
दोस्तों, ये Important Point है, पित्त और रक्त का आश्रय-आश्रयी संबंध है।
रक्त धातु(Rakta Dhatu) की चिकित्सा –
प्यारे विद्यार्थियों, हमने ऊपर रक्त की वृद्धि, रक्त के क्षय और रक्त जब दूषित होता है तो उनके लक्षण कौन से रोग होते हैं, ये सब देखा। लेकिन अगर हमें रक्त धातु की चिकित्सा की बात करें तो हमें आचार्यों और शास्त्रों में क्या लिखा है, इसके बारे में हम देखेंगे।
चरक सूत्र 24/18 — रक्त के उपाय।
“रक्तक्षये मलस्रावणं विरेचनमुपवासश्च।”
जब रक्त धातु दूषित हो जाए तो उसकी चिकित्सा करने के निम्न सिद्धांत हैं।
- पहला— रक्तमोक्षण। सबसे प्रमुख चिकित्सा है ये, क्योंकि सुश्रुत ने इसे अर्ध चिकित्सा माना है। इसमें शिरावेध, जलौका, शृंग, अलाबू, दूषित रक्त निकालना, चरक ने रक्त रोगों में इसका प्रथम उपाय बताया है।
- विरेचन— दो नंबर। पित्त और रक्त का संबंध होने से पित्तनाशक विरेचन से रक्त की शुद्धि होती है।
- तीन नंबर— उपवास या लंघन। इसमें आपको हल्का आहार लेना चाहिए या फिर बिल्कुल ही फलाहार पर रहना चाहिए।
- चार नंबर— रक्तप्रसादन द्रव्य। मधुर, तिक्त, कषाय रस वाली औषधियों का सेवन रक्त धातु की चिकित्सा में काम आता है।
आचार्य चरक के अनुसार रक्तप्रसादक द्रव्य की हम बात करें तो उसमें मञ्जिष्ठा, सारिवा, खदिर, गुडूची, नीम, हरिद्रा, इनका प्रयोग हम रक्तशोधन में भी करते हैं।
सुश्रुत सूत्र 14 में रक्त की रक्षा का नियम बताया गया है— “शोणितं हि रक्षेत्।” रक्त की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि रक्त ही जीवन है। बिना कारण रक्तमोक्षण नहीं करना चाहिए।
आचार्य वाग्भट ने भी कहा, शीतल द्रव्य, तिक्त घृत, रक्तमोक्षण ही रक्त की शुद्धि चिकित्सा है।
परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्न –
(1) रक्त का अंजली प्रमाण कितना है?
उत्तर: आठ।
(2) रक्त धातु का प्राकृत कर्म आचार्य सुश्रुत के अनुसार क्या है?
उत्तर: वर्ण प्रसाद, जीवनम्, मांस पुष्टि, और आचार्य वाग्भट के अनुसार जीवनम् प्राकृत रक्त कर्म है रक्त का।
(3) रक्त धातु के क्षय का लक्षण क्या है?
उत्तर: सीरा शैथिल्य, अम्ल-शीत प्रार्थना, त्वक् स्फुटन और रूक्षता।
(4) रक्त धातु वृद्धि के प्रमुख लक्षण?
उत्तर: सीरा पूर्णत्व, रक्तांगता।
(5)रक्त धातु की उत्पत्ति रस धातु से होती है। रंजक पित्त द्वारा रस को रंगा जाता है।
(6) रक्त का स्थान: यकृत और प्लीहा होता है।
(7)शुद्ध रक्त का वर्ण: तप्त स्वर्ण, इंद्रगोप कीट के समान और गुंजा फूल के समान माना जाता है।
(8)रक्त धातु के गुण: द्रव, सर, उष्ण, लघु होते हैं।
(9)रक्त धातु का कार्य: जीवन धारण करना, मांस धातु का पोषण करना।
(10)रक्त धातु की उपधातु: कंड्रा और शिरा।
(11)रक्त धातु का मल: पित्त।
(12)रक्त धातु का आश्रय: पित्त दोष।
(13)रक्तवह स्रोतस का मूल: यकृत, प्लीहा और रक्तवह धमनियाँ।
(14)रक्त धातु का संबंध: तेज महाभूत से अधिक होता है।
(15)रक्त प्रदोषज विकार: विसर्प, कुष्ठ, रक्तपित्त, गुदपाक, मुखपाक।
(16)रक्त धष्टि का कारण: विदाही, उष्ण, अम्ल पदार्थों का अधिक सेवन।
(17)रक्त धातु में: ओज का दश्वा भाग रहता है।
(18)रक्त धातु की वृद्धि में: शिरावेध और रक्तमोक्षण करना सही फायदेमंद होता है।
(19)रक्त का पाक: कटु रस में परिणत माना गया है।
(20)रक्त का कार्य आधुनिक मतानुसार: ऑक्सीजन का वहन और हीमोग्लोबिन से तुलना।
(21)रक्त धातु का सार: व्यक्ति स्निग्ध, रक्त वर्ण वाले नख, नेत्र और त्वचा वाला होता है।
निष्कर्ष
इस लेख में हमने चरक, सुश्रुत और वाग्भट के अनुसार रक्त धातु (Rakta Dhatu) का वर्णन देखा, तो हमने ये पाया कि उनका वर्णन करने का जो है, एक ही सिद्धांत पर उन्होंने वर्णन किया, लेकिन उनके वर्णन करने की व्याख्या शैली अलग-अलग थी। जैसे चरक ने कायचिकित्सा की दृष्टि से निदान और संप्राप्ति पर जोर दिया, सुश्रुत ने शल्य की दृष्टि से रक्तमोक्षण और शुद्ध-अशुद्ध रक्त की परिभाषा की, जबकि वाग्भट ने दोनों को संक्षिप्त और व्यवहारिक रूप से समझाया।
इससे ये होता है कि अगर रक्त धातु शुद्ध रहेगा, तो शरीर में कान्ति, बल, उत्साह, जीवन सब बना रहेगा। इसलिए दिनचर्या, ऋतुचर्या और आहार-विहार का पालन करके रक्त को शुद्ध रखना स्वास्थ्य का हमारा मूल मंत्र होना चाहिए।
संदर्भ ग्रंथ:
- चरक संहिता, चक्रपाणि टीका सहित, सूत्रस्थान 24, विमान 5 और 8।
- सुश्रुत संहिता, डल्हण टीका सहित, सूत्रस्थान 14, 15, 24।
- अष्टांग हृदय, अरुणदत्ती टीका सहित, सूत्रस्थान 11, 27।
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Amalki – Parichay, Guna, Karya, Upyog aur Shodha
नोट: ये लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से है। किसी भी रक्तक रोगी की चिकित्सा हेतु अपने नजदीकी आयुर्वेद वैद्य से परामर्श ज़रूर करें। अपने खुद से डॉक्टर या चिकित्सक नहीं बनें।
✍️ Lekhak: Ayurved Study Hub Research Team
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📖 Reference: Charak Samhita, Bhavprakash Nighantu
⚠️ Disclaimer: Yah lekh keval shiksha ke liye hai. Kisi bhi aushadhi ka sevan karne se pehle apne Vaidya se paramarsh jarur le.
