Yoga and Ayurveda Kya Hai? Ayurved Me Yog Ka Mahatva

आज के समय में ayurveda and yoga दोनों ही स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी हैं।आयुर्वेद के अंतर्गत औषधियों का वर्णन, दिनचर्या, ऋतुचर्या आदि का वर्णन मिलता है। उसी तरह योग भी अपने आप में एक पूरा विषय है।

आज के हमारे इसी आर्टिकल में हम यही समझेंगे कि yoga and ayurveda, योग की परिभाषा क्या है, उसका प्रयोजन क्या है, योग के अंग कौन-कौन से हैं और इन सभी टॉपिकों को हम अच्छे से क्लियर करेंगे, ताकि आप किसी भी आने वाली परीक्षा में योग से संबंधित कोई भी Questions आए, तो आप उसे अच्छे से और आराम से कर सकें।

योग क्या है? योग की परिभाषा(yoga in hindi)

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योग शब्द संस्कृत की “युज्” धातु से बना है। “युज्” का अर्थ होता है जोड़ना, मिलाना और समाधि।

Yoga And Ayurveda साधारण और आसान भाषा की तरफ हम बात करें तो हमारी आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाली हर प्रक्रिया योग ही है। मन को बाहरी दुनिया से हटाकर अंदर की ओर ले जाना और उसे स्थिर करना योग का प्रमुख कार्य है। आत्मा से परमात्मा का मिलन, यही एक अच्छे योग का उदाहरण है।

शास्त्रों में योग की पाँच सबसे महत्वपूर्ण परिभाषाएँ हैं।

1. योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः – योगसूत्र 1/2

यह सबसे प्रसिद्ध परिभाषा है। मन में लगातार उठने वाली तरंगों, विचारों और हलचलों को पूरी तरह से रोक देना ही एक तरह का योग है।

हमारे शरीर में ग्यारह इंद्रियाँ हैं, जिसमें पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ और एक मन है। मन को उभयात्मक इंद्रिय कहा जाता है, क्योंकि यह ज्ञानेंद्रिय भी है और कर्मेंद्रिय भी।

यही मन इंद्रियों के साथ मिलकर पूरे दिन भाग-दौड़ करता है। इसी भाग-दौड़ को शांत करना ही चित्तवृत्ति निरोध कहलाता है।

2. समत्वं योग उच्यते – गीता 2/48

भगवद्गीता में भी योग के बारे में बहुत अच्छे दो-तीन श्लोक हैं। मैं खुद पर्सनली भगवद्गीता को पढ़ता भी हूँ और मैंने इन योगों के बारे में उसमें क्या-क्या लिखा है, वो सब मैंने अच्छे से देखा भी है।

तो ये जो “समत्वं योग उच्यते” है, इसका अर्थ ये हुआ कि जीवन में समान भाव से रहना ही योग है।

सांख्य दर्शन के अनुसार यह पूरी सृष्टि अव्यक्त, महान, अहंकार, पंचतन्मात्रा, इंद्रियों और पंचमहाभूतों से मिलकर बनी है। इनमें अव्यक्त, महान और अहंकार आध्यात्मिक भाव हो गए और पंचतन्मात्रा, इंद्रियाँ तथा पंचमहाभूत भौतिक भाव हो गए। मन इन दोनों के बीच का एक माध्यम है।

3. दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् – गीता 6/23

अर्थात यह संसार दुखों से भरा हुआ है। इस दुख के संयोग से खुद को अलग कर लेना, वियोग कर लेना ही योग कहलाता है।

और ये श्लोक मैंने भगवद्गीता में बहुत बार पढ़ा है और ये मेरे सबसे पसंदीदा श्लोकों में से एक है।

4. योगः कर्मसु कौशलम् – गीता 2/50

अर्थात कर्म में कुशलता ही योग है।

हम जो भी काम करते हैं, उसमें हमारा स्वार्थ, फल की इच्छा और अहंकार जुड़ा रहता है। इस कारण काम में कुशलता नहीं आ पाती। यदि हम फल की इच्छा छोड़कर, बिना किसी स्वार्थ के अपना काम पूरी कुशलता से करें, तो वही योग है।

ऐसा काम करने से हमें पुण्य प्राप्त होगा, सुख-दुख का बंधन नहीं लगता और अंत में मोक्ष की हमें प्राप्ति होगी।

5. दर्शनाभ्युपायो योगः

अर्थात ईश्वर के दर्शन या उसे जानने के लिए जो भी उपाय किए जाते हैं, वह सब योग है। एकाग्रचित्त होकर भगवान का स्मरण करना भी योग कहलाता है।

दोस्तों, ये रही योग की परिभाषाएँ—भगवद्गीता के अनुसार और सांख्य के दृष्टिकोण के अनुसार, जो हमारे परीक्षा के दृष्टि से भी बहुत ही इंपोर्टेंट है।

योग क्यों करना चाहिए? – योग के चार प्रयोजन

शास्त्रों में योग के चार प्रमुख या मुख्य उद्देश्य भी हम कह सकते हैं, वो बताए गए हैं, जिन्हें हम क्रमवार समझेंगे।

1. स्वास्थ्य का संवर्धन

शरीर को रोगों का घर कहते हैं, क्योंकि रोग दो प्रकार के होते हैं- शारीरिक और मानसिक। शारीरिक रोगों को ठीक करने के लिए हठयोग के आसन और मानसिक रोगों के लिए यम-नियम का पालन आदि बताए गए हैं।

कहा भी गया है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। आसनों में शरीर के अंग-प्रत्यंग का वैज्ञानिक तरीके से व्यायाम होता है।

जब शरीर स्वस्थ हो और मन प्रसन्न रहता है, तो व्यक्ति शांत, सहनशील और सहयोगी बनता है, जिससे उसका पारिवारिक और सामाजिक जीवन सुखी रहता है।

2. रोगों की चिकित्सा

योग सिर्फ बचाव नहीं है, बल्कि उपचार भी है। प्राणायाम से श्वसन संस्थान के रोग और विभिन्न आसनों से अलग-अलग शारीरिक रोग ठीक होते हैं और इस बारे में शोध भी हो चुका है।

हर इंसान की प्रकृति, सार, सत्त्व, सहनन, रुचि और शक्ति अलग-अलग होती है। इसलिए सबकी जरूरत को पूरा करने के लिए योग के कई प्रकार बताए गए हैं- ध्यान योग, ज्ञान योग, हठयोग, राजयोग, कर्मयोग, सांख्ययोग आदि।

इसका उद्देश्य अस्वस्थ व्यक्ति को स्वस्थ बनाकर उसे मोक्ष के मार्ग पर ले जाना है।

3. सिद्धियों की प्राप्ति

हमारे शरीर में जो आत्मा है, वह परमात्मा की ही प्रतिनिधि और उसका अंश है। यह बात योग के बारे में विशेष तौर पर कही गई है।

आत्मा परमात्मा से मिलना चाहती है, लेकिन मन उसे बाहरी विषय-भोगों में फँसाए रखता है। मन में सत्त्व, रज और तम-ये तीन गुण होते हैं, जो एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। इसी कारण मन चंचल रहता है और एक भोग से दूसरे भोग में भागता रहता है। इसी भागदौड़ के कारण वह दुखी रहता है।

इसलिए दुख का असली कारण मन है। मन की वृत्तियों को रोकने से ही सुख मिलता है और परमात्मा से मिलन होता है, जिससे सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

4. बुद्धि और प्रज्ञा का विकास

प्रज्ञा को ही बुद्धि कहा जाता है। जब व्यक्ति धी, धृति और स्मृति के विभ्रष्ट हो जाने पर गलत काम करता है, तो उसे प्रज्ञापराध कहते हैं। यही सभी रोगों की जड़ है।

श्लोक के माध्यम से समझें तो –

“धी-धृति-स्मृति-विभ्रंशः सम्प्राप्तः कर्म यत्कृतम्।

प्रज्ञापराधं तं विद्यात् सर्वदोषप्रकोपणम्॥”

अर्थात योग करने से मन में सात्त्विक गुण बढ़ता है और राजसिक तथा तामसिक गुण घटते हैं। सत्त्व गुण प्रकाश देने वाला है, जिससे व्यक्ति की बुद्धि का विकास होता है और वह सोच-समझकर सही कार्य करता है।

योग के प्रमुख अंग – अष्टांग योग का विस्तार से वर्णन

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में योग के आठ अंगों का विस्तृत रूप से वर्णन किया है, जिनका हमें ध्यान होना बहुत ही ज़रूरी है। चाहे आप आयुर्वेद के स्टूडेंट हों या चाहे आयुर्वेद के किसी भी फील्ड में आप जुड़े हों।

तो महर्षि पतंजलि ने एक सूत्र दिया है इसके बारे में –

“यम-नियमासन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधयोऽष्टावङ्गानि॥”

— योगसूत्र 2/29

अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। ये अष्टांग के रूप में भी प्रचलित हैं और ये योग के आठ अंग हैं।

इनमें सबसे पहले वाले पाँच – यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार – को बहिरंग साधन माना गया है, क्योंकि ये बाहरी शुद्धि से संबंधित हैं। और अंतिम के जो तीन हैं – धारणा, ध्यान और समाधि – इनको अंतरंग साधन कहा जाता है, क्योंकि यह आंतरिक साधना है।

इन आठों का पालन करने से चित्त की अशुद्धियाँ नष्ट हो जाती हैं। तो अब हम हरेक एक-एक की डिटेल-वाइज विवेचना करेंगे।

अंग 1 – यम(yoga and ayurveda)

यम समाज के साथ हमारे व्यवहार के नियम हैं। ये पाँच प्रकार के नियम हैं –

1. अहिंसा

2. सत्य

3. अस्तेय

4. ब्रह्मचर्य

5. अपरिग्रह

अंग 2 – नियम

इसके भी पाँच भाग हैं, जो इंपोर्टेंट हैं थोड़े से, जिनमें सबसे पहला है –

1. शौच – शुद्धि

बाहरी शौच में शरीर को जल, मिट्टी आदि से साफ रखना होता है और आंतरिक शौच में मन से अहंकार, ईर्ष्या, काम, क्रोध, लोभ और द्वेष को निकालना होता है।

दूसरे प्रकार से हम ये कह सकते हैं कि कायिक शुद्धि, वाचिक शुद्धि और मानसिक शुद्धि।

इसका लाभ बाहरी शौच से शरीर की शुद्धि और आंतरिक शौच से बुद्धि की शुद्धता, मन की प्रसन्नता, इंद्रियों पर विजय और आत्मसाक्षात्कार की योग्यता देखने को मिलती है।

2. संतोष

अपनी मेहनत और ईमानदारी से कुछ भी धन या सुख हमें मिलता है, उसी में खुश रहना ही संतोष कहलाता है।

ज्यादा पाने की लालसा में दुखी न होना। व्यक्ति को सुख-दुख, लाभ-हानि दोनों को ईश्वर का प्रसाद मानकर समान भाव से स्वीकार करना चाहिए।

संतोष से बड़ा कोई सुख नहीं है।

3. तप

तप का अर्थ तपस्या है। अपने सुखों का त्याग करके शरीर और मन को मजबूत बनाना, भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, सुख-दुख जैसे द्वंद्वों को सहन कर लेना ही तप कहलाता है।

4. स्वाध्याय

मोक्ष देने वाले शास्त्र, जैसे वेद, उपनिषद और गीता को पढ़ना, अपने इष्ट देवता के मंत्र का जाप करना, यही स्वाध्याय कहलाता है।

यह दिनचर्या का एक हिस्सा है। आयुर्वेद में सुबह उठकर, दोपहर और रात में स्वाध्याय करने को कहा है। इससे इष्ट देवता के दर्शन होते हैं और ज्ञान की प्राप्ति होती है।

5. ईश्वर प्रणिधान

अपने सभी क्रियाओं, अपने सभी कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर देना, यह ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव है।

इसका अर्थ केवल फल-फूल चढ़ाना नहीं है, बल्कि हर क्रियाकलाप को उस परम गुरु ईश्वर को सौंपकर उसकी शरण में रहना, यही ईश्वर प्रणिधान है।

अंग 3 – आसन

योगशास्त्र में इसके बारे में कहा है –

“स्थिरसुखमासनम्॥”

– योगसूत्र 2/46

जिसमें स्थिरता से और सुखपूर्वक बैठा जा सके, वही आसन है।

आचार्यों ने आसन की अनेक परिभाषाएँ दी हैं, जिनमें हम कुछ मुख्य परिभाषाओं को देखते हैं।

(1)जिन विधियों से अधिक समय तक बिना कष्ट के बैठा जा सके, वे आसन हैं।

(2)स्थिर भाव से, निश्चल रूप से, सुखपूर्वक बैठना आसन है।

(3)शरीर को बिना हिलाए-डुलाए, बिना दुखी हुए, लंबे समय तक एक ही स्थिति में सुख से बैठना आसन कहलाता है।

(4)निश्चल और सुख देने वाले बैठने का सही तरीका ही आसन है।

हम निष्कर्ष तौर पर यह कह सकते हैं कि बैठने के उन सभी प्रकारों को आसन कहते हैं, जिनसे शरीर में स्थिरता आती है और लंबे समय तक सुख से बैठा जा सकता हो।

अंग 4 – प्राणायाम

प्राणवायु का शरीर के अंदर आना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास। इन दोनों की गति का रुक जाना या नियंत्रित हो जाना ही प्राणायाम कहलाता है।

योगशास्त्र के अनुसार आसन सिद्ध हो जाने के बाद श्वास-प्रवाह की गति को रोकना प्राणायाम है।

अंग 5 — प्रत्याहार

प्रत्याहार का सामान्य अर्थ है – पीछे हटना, वापस लाना, रोकना, इंद्रियों का दमन करना आदि।

इंद्रियों को बाहरी विषयों से समेटकर मन में विलीन करने के अभ्यास को ही प्रत्याहार कहते हैं।

आयुर्वेद में मन का कर्म बताते हुए कहा गया है कि इंद्रियों के संचालन को रोकना और इंद्रियों को इष्ट विषयों से रोकना मन का कर्म है।

लाभ

प्रत्याहार सिद्ध होने पर इंद्रियाँ योगी के वश में हो जाती हैं और इंद्रियों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाता है।

अंग 6 – धारणा

धारणा का हम अर्थ इस बात से समझ सकते हैं कि चित्त को किसी एक विशेष स्थान में स्थित करना, किसी एक वस्तु पर मन को केंद्रित करना धारणा कहलाता है। जैसे अपने सामने कोई वस्तु या जलता हुआ दीया, चंद्रमा, फूल आदि को देखना।

वैसे मैं भी सुबह ध्यान लगाता हूँ, तो अपने बेड के बीच में भगवान की तस्वीर जैसा एक प्रतिबिंब बना लेता हूँ और उसी में मुझे बहुत आनंद आता है। तो यही एक तरह से धारणा होती है।

जैसे-जैसे हम धारणा का अभ्यास करेंगे, अपने अंदर की शक्ति का उदय होता प्रतीत होता है। धारणा के अभाव में बहुत सी मानसिक शक्तियों का ह्रास होता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति के सामने बहुत सी समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं।

परंतु जिस कार्य में उसे छह घंटे लगते हैं, वही कार्य एकाग्र मन से करने पर मात्र दो घंटे में हो जाता है।

अतः धारणा का प्रयोग करने से सभी कार्य अधिक कुशलता, अधिक शीघ्रता और बिना किसी परिश्रम के पूरे किए जा सकते हैं।

अंग 7 – ध्यान

ध्यान का तात्पर्य हम इस बात से कर सकते हैं कि किसी एक विषय-वस्तु पर ज्ञान की एकाग्रता या एकतानता है। अथवा ध्येय पदार्थ में एकतान स्वरूप से लगे रहना ही ध्यान है।

इस अवस्था में उसे ध्येय वस्तु के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं देता। इसमें ध्येय पदार्थ के वास्तविक स्वरूप को समझना ही मुख्य काम है।

ध्यान की दो मुख्य अवस्थाएँ बताई गई हैं –

1. अन्य विषयों और विचारों को हटाकर एक ही विषय या विचार पर लगाना या चिंतन करना।

2. सभी विचारों से मन को पूरी तरह से मुक्त रखना।

अंग 8 – समाधि

जब ध्यान में केवल ध्येय पदार्थ ही दिखाई दे और चित्त के अपने स्वरूप का भी अभाव हो जाए, तब वही ध्यान समाधि कहलाता है।

अतः यह हम कह सकते हैं कि समाधि ध्यानाभ्यास की उच्चतम अवस्था है, जिसमें केवल ध्येय पदार्थ की प्रतीति होती है।

सामान्यतः ध्यान की अवस्था में ध्याता, ध्यान और ध्येय – तीनों की प्रतीति होती है, लेकिन समाधि की अवस्था में चित्त में केवल ध्येय पदार्थ ही रह जाता है।

आयुर्वेद में योग का वर्णन(yoga and ayurveda)

आयुर्वेद में योग का वर्णन सबसे महत्वपूर्ण टॉपिक है।

मनुष्य का जन्म चार पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए हुआ है – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। ये तभी संभव हैं, जब व्यक्ति स्वस्थ रहेगा। स्वस्थ रहने के लिए नियमित रूप से दिनचर्या, ऋतुचर्या, रात्रिचर्या, व्यायाम और सद्वृत्त का पालन करेगा।

“धर्मार्थकाममोक्षाणाम् आरोग्यं मूलमुत्तमम्।”

– चरक संहिता, सूत्रस्थान 1/15

अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों का उत्तम मूल आरोग्य है।

योग के द्वारा भी मोक्ष की प्राप्ति की जाती है। आयुर्वेद और योग दोनों मानव के लिए हितकारी प्राचीन विद्याएँ हैं।

वास्तव में योग भी आयुर्वेद का ही एक अंग के तौर पर हम कह सकते हैं। जहाँ आयुर्वेद आयु का विज्ञान है और शरीर, इंद्रिय, मन तथा आत्मा के सहयोग के बिना सृष्टि संभव नहीं है, तो दोस्तों, वही योग मन और आत्मा के विज्ञान को लेकर चलता है।

आयुर्वेद उस सृष्टि या व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए त्रिसूत्र यानी हेतु, लिंग और औषध तथा निदान पंचक को लेकर चलता है। वहीं योग तत्त्वज्ञान और तत्त्वानुभूति के अलावा आंतरिक दुःख-निरोधी और मोक्ष को दिलाने वाली विद्या है।

आयुर्वेद शास्त्र से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्यता, योग शास्त्र से मानसिक स्वास्थ्यता और व्याकरण शास्त्र से वाणी की स्वास्थ्यता प्राप्त की जा सकती है।

इसलिए आचार्य चक्रपाणि ने एक श्लोक के माध्यम से बताया—

“पातञ्जलमहाभाष्यचरकप्रतिसंस्कृतैः।

मनोवाक्कायदोषाणां हर्त्रेऽहिपतये नमः॥”

अर्थात् पतञ्जलि के महाभाष्य, महाभाष्य के संस्कार तथा चरक के द्वारा मन, वाणी और शरीर के दोषों को दूर करने वाले भगवान् अहिपति को नमस्कार है।

– चक्रपाणि, आयुर्वेददीपिका

योग का संक्षिप्त इतिहास एवं विकास

योग इतिहास से भी बहुत पुराना है। ये कोई पाँच हजार साल पहले की बात नहीं है, बल्कि योग हजारों साल पुराना विज्ञान है और हमारी संहिताओं में इसका अच्छे से वर्णन भी देखने को मिलता है।

तो हम इसे विभिन्न कालों में बाँटकर योग के बारे में इतिहास की जानकारी लेंगे।

A. प्रारंभिक काल

सिंधु घाटी सभ्यता में प्राप्त एक प्रसिद्ध मुहर पर एक योगी-सदृश आकृति दिखाई देती है, जिसे परंपरागत रूप से पशुपति या प्रोटो-शिव से जोड़ा जाता है। इसमें एक व्यक्ति ध्यानमुद्रा जैसी स्थिति में बैठा हुआ दिखाई देता है। इसे योग की प्राचीन परंपरा से संबंधित एक महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक प्रमाण के रूप में देखा जाता है।

B. वैदिक और उपनिषद काल

वेदों में योग का उल्लेख मन को एकाग्र करने के रूप में मिलता है। उपनिषदों में योग को आत्मा और परमात्मा के मिलन का साधन भी बताया गया है।

कठोपनिषद में योग को इंद्रियों और मन के संयम के रूप में बताया गया है।

तो प्रारंभिक काल में भी योग का वर्णन देखने को मिला और वैदिक एवं उपनिषद काल में भी योग का वर्णन प्रमुख रूप से मिलता है।

C. सूत्र काल

यहीं पर योग के व्यवस्थित रूप से वर्णन करने वाले महर्षि पतंजलि का काल आता है। महर्षि पतंजलि ने पहले से प्रचलित योग-ज्ञान को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करते हुए योगसूत्र की रचना की। इसलिए उन्हें योग को व्यवस्थित रूप देने वाला प्रमुख आचार्य माना जाता है।

उन्होंने योग के आठ अंगों—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—का व्यवस्थित वर्णन किया।

D. मध्यकाल

इस काल में हठयोग का बहुत विकास हुआ। गोरखनाथ, मत्स्येंद्रनाथ जैसे नाथ योगियों ने हठयोग की परंपरा को आगे बढ़ाया। हठयोग से संबंधित ग्रंथों में आसन, प्राणायाम, षट्कर्म आदि का प्रचुर मात्रा में उल्लेख मिलता है। इस परंपरा में घेरंड संहिता जैसे ग्रंथ भी महत्वपूर्ण हैं।

E. आधुनिक काल

स्वामी विवेकानंद, स्वामी शिवानंद, बी. के. एस. अयंगर, महर्षि महेश योगी जैसे गुरुओं ने योग को विदेशों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

21 जून 2015 को भारत के प्रयास से पहला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। तब से योग पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया।

तो दोस्तों, ऐसा नहीं है कि योग अभी का है। योग का वर्णन पुरातन काल से मिलता हुआ आया है और प्राचीन काल में भी योग से संबंधित महत्वपूर्ण प्रमाण मिलते हैं।

योग का अर्थ केवल आसन करना नहीं है, बल्कि यह मन, शरीर और आत्मा से संबंधित एक व्यापक साधना-पद्धति है।

योग के मुख्य लाभ

योग केवल एक व्यायाम नहीं है, यह हमारे शरीर, मन और आत्मा को जोड़ने की एक प्राचीनतम विधि है। योग को हम अपने आप में एक पूरी चिकित्सा के रूप में देख सकते हैं। अगर आप आयुर्वेद और योग को साथ लेकर चलते हैं, तो आपको इसके बहुत ही फायदे देखने को मिलते हैं।

तो हम इनको निम्न क्रमशः टॉपिक के माध्यम से समझेंगे कि योग के फायदे शारीरिक तौर पर क्या हैं, मानसिक तौर पर क्या हैं, आयुर्वेद के अनुसार फायदे क्या-क्या हैं। इन सभी के बारे में हम पूरी विस्तृत जानकारी लेंगे।

1. शारीरिक फायदे

  • योग करने से शरीर लचीला और मजबूत बनता है। रोज योग करने से हमारी मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं और इनमें लचीलापन आता है।
  • इम्युनिटी बढ़ती है। प्राणायाम और आसन करने से हमारे शरीर में रोगों के प्रति लड़ने की जो रोग-प्रतिरोधक क्षमता है, वह बढ़ती है।
  • योग में कुछ आसन ऐसे हैं, जैसे मंडुकासन, वज्रासन। इन आसनों को करने से गैस, कब्ज और अपच की जो समस्याएँ हैं, वे दूर होती हैं।
  • हमारा जो वजन है, योग करने से वह नियंत्रित रहता है। जैसे सूर्य नमस्कार, कपालभाति आदि करने से हमारे शरीर में जो चर्बी की मात्रा है, वह घटती है।
  • योग करने से ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल में रहता है, जिससे हमारा हृदय स्वस्थ रहता है।

2. मानसिक फायदे

  • तनाव और चिंता दूर होती है।
  • याददाश्त और एकाग्रता बढ़ती है।
  • अच्छी नींद आती है।

3. आयुर्वेद के अनुसार फायदे

योग करने से वात, पित्त, कफ दोष संतुलित रहते हैं।

आयुर्वेद में कहा गया है कि योग के बिना स्वस्थ जीवन संभव नहीं है। योग ही वह सेतु है, जो आयुर्वेद के लक्ष्य, स्वास्थ्य की रक्षा, को पूरा कर सकता है।

निष्कर्ष

तौर पर हम यह कह सकते हैं कि योग करने के बहुत ही अपने आप में फायदे हैं। अलग-अलग आसन और अलग-अलग प्राणायाम करने से अलग-अलग फायदे हमें देखने को मिलते हैं।

FAQ

1. योग का क्या अर्थ है?

उत्तर: योग संस्कृत की ‘युज्’ धातु से बना है। इसके मुख्यतः तीन अर्थ हैं— जोड़ना, समाधि और कुशलता।

2. योग का महत्व क्या है?

उत्तर: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य के पास तीन इच्छाएँ हैं— प्राणैषणा, धनेषणा और परलोकेषणा। इन सबके लिए शरीर का स्वस्थ होना जरूरी है और योग का काम यही है।

3. योग के जनक कौन हैं?

उत्तर: भगवान शिव को आदियोगी कहा जाता है। वे योग के पहले गुरु हैं, जिन्होंने सप्तऋषियों को ज्ञान दिया। लेकिन व्यावहारिक रूप से योग के जनक और पिता महर्षि पतंजलि को माना जाता है, क्योंकि उन्होंने ही योग के बिखरे ज्ञान को सूत्रों में पिरोकर सबके लिए आसान बनाया।

4. योग के कितने चरण और प्रकार हैं?

उत्तर: योग के आठ चरण हैं, जिन्हें अष्टांग योग कहते हैं—

1. यम

2. नियम

3. आसन

4. प्राणायाम

5. प्रत्याहार

6. धारणा

7. ध्यान

8. समाधि

पहले पाँच को बहिरंग और अंतिम तीन को अंतरंग कहा जाता है। यही योग के आठ चरण हैं।

(5) योग के छह मुख्य प्रकार हैं—

1. हठयोग

2. राजयोग

3. कर्मयोग

4. भक्तियोग

5. ज्ञानयोग

6. मंत्रयोग

6. लोकप्रिय बारह योगासन कौन-कौन से हैं?

उत्तर: सूर्य नमस्कार, ताड़ासन, वज्रासन, भुजंगासन, वक्रासन, पद्मासन, सर्वांगासन, हलासन, धनुरासन, त्रिकोणासन, शवासन और अनुलोम-विलोम।

प्रश्न नंबर 7. योग के मुख्य लाभ क्या हैं?

उत्तर: योग के पाँच सबसे बड़े फायदे हैं—

1. शरीर को लचीला और मजबूत बनाना।

2. मन को शांत और एकाग्र करना।

3. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना।

4. तनाव और चिंता कम करना।

5. नींद अच्छी आना और पाचन ठीक रहना।

प्रश्न नंबर 8. योग के दस लाभ क्या हैं?

उत्तर:

1. वजन नियंत्रित रहता है।

2. ब्लड प्रेशर और शुगर कंट्रोल में रहते हैं।

3. रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है।

4. फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है।

5. हार्मोन संतुलित रहते हैं।

6. याददाश्त और बुद्धि तेज होती है।

7. शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं।

8. आत्मविश्वास बढ़ता है।

9. बुढ़ापा देर से आता है।

10. मन में सकारात्मकता आती है और आचार रसायन के गुण विकसित होते हैं।

प्रश्न नंबर 9. थायरॉयड के लिए कौन-सा योग अच्छा रहता है?

उत्तर: थायरॉयड ग्रंथि गले में होती है। इसके लिए गर्दन को खींचने वाले आसन सबसे अच्छे माने गए हैं, जैसे सर्वांगासन, हलासन और मत्स्यासन। ये तीनों थायरॉयड के लिए सबसे उत्तम माने जाते हैं। इसके साथ उज्जायी प्राणायाम और कपालभाति भी लाभदायक हैं।

नोट: यह सामान्य जानकारी है। थायरॉयड की स्थिति में किसी योग गुरु या डॉक्टर की सलाह से ही अभ्यास शुरू करें।

प्रश्न नंबर 10. योग शिक्षा क्या है?

उत्तर: योग शिक्षा का अर्थ है योग के सिद्धांतों को पढ़ाना और जीवन में उसे उतारना। इसमें सिर्फ आसन कराना नहीं आता, बल्कि यम, नियम, आहार, विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या और सकारात्मक सोच की शिक्षा देना भी शामिल है। आयुर्वेद में स्वस्थवृत्त में योग शिक्षा को स्वास्थ्य रक्षा का मुख्य साधन बताया गया है।

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योग के वैज्ञानिक लाभ

✍️ Lekhak: Ayurved Study Hub Research Team
Rajasthan se, 6+ saal ka Ayurved field research anubhav. 150+ jadi-bootiyon ki swayam pehchan.

📖 Reference: Charak Samhita, Bhavprakash Nighantu
⚠️ Disclaimer: Yah lekh keval shiksha ke liye hai. Kisi bhi aushadhi ka sevan karne se pehle apne Vaidya se paramarsh jarur le.

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