दोस्तों, आज का हमारा जो टॉपिक है, वो Neem ke fayde in Hindi के बारे में है। नीम के बारे में हम आयुर्वेद के दृष्टिकोण से और आज के समय में नीम किन-किन बीमारियों में फायदेमंद रहता है, इसके बारे में विस्तार से जानेंगे।
नीम के बारे में जितने भी फायदे और नुकसान हैं, उन सभी का हम विस्तार से वर्णन करेंगे।आर्टिकल थोड़ा लंबा होगा, इसलिए आप पूरा आर्टिकल पढ़िए। इससे आपको नीम के बारे में बहुत ही फायदेमंद और महत्वपूर्ण जानकारी मिलेगी।
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नीम क्या है?(What is Neem in Hindi?)
नीम – आयुर्वेदीय परिचय

परिचय एवं विभिन्न नाम
आयुर्वेद में नीम को निम्ब कहा गया है। इसका वानस्पतिक नाम Azadirachta indica है और अंग्रेजी में हम इसे Margosa Tree कहते हैं।
आयुर्वेद के ग्रंथों में इसके गुणों के आधार पर अनेक पर्याय बताए गए हैं, जिनमें मुख्यतः निम्ब है—निम्ब, जो स्वास्थ्य को बढ़ाता है; पिच्छुमर्द, जो कुष्ठ आदि चर्म रोगों को नष्ट करता है; अरिष्ट, जिसके सेवन से शरीर को कोई हानि नहीं होती; हिङ्गुनिर्यास, जिससे हिङ्ग के समान गोंद निकलता है।
इसे हिंदी में नीम, बंगला में नीम, मराठी में कडुनिंब, गुजराती में लिंबडो और मलयालम में वेप्पु कहा जाता है।
नीम के वानस्पतिक परिचय –
नीम का वृक्ष 40 से 50 फुट तक ऊँचा होता है और इसका जो तना होता है, वह सीधा होता है और चारों ओर इसकी विभिन्न शाखाएँ निकली होती हैं।
(1)नीम छाल
सबसे पहले हम बात करेंगे नीम की छाल के बारे में। बाहर की ओर गहरी भूरी और अंदर की ओर लाल रंग की यह छाल होती है। इस पर तीखी और लंबी रेखाएँ होती हैं। इससे एक प्रकार का रस निकलता है, जिसे नीम की ताड़ी भी कहते हैं।
(2)नीम पत्ते
पत्ते विषमपक्षवत होते हैं और प्रत्येक शाखा 8 से 15 इंच लंबी होती है। प्रत्येक शाखा में जो पत्ते हैं, वे 1 से 3 इंच लंबे और आधे से डेढ़ इंच चौड़े, बाले के आकार के, दाँतेदार पत्रक 5 से 9 जोड़ों में होते हैं।
सामान्यतः आप यह देखते भी होंगे, गाँवों में और शहरों में भी नीम का वृक्ष दिखाई देता है।
(3)नीम फूल
इसके फूल छोटे और सफेद रंग के होते हैं, जो गुच्छों में लगते हैं।
(4)नीम फल
नीम के फल लंबे, गोलाकार, आधे से एक इंच चौड़े और एक इंच लंबे होते हैं। कच्ची अवस्था में यह हरे होते हैं और पकने पर ये पीले हो जाते हैं। इसे गाँव-देहात में निंबोली कहते हैं।
प्रत्येक फल में एक बीज होता है, जिससे हम तेल भी निकाल सकते हैं और बीज का तेल निकाला भी जाता है।
(5)फूल-फल का समय
पतझड़ में पत्तियाँ गिर जाती हैं और वसंत में नए ताम्र रंग के कोमल पत्ते फिर से आते हैं। फूल वसंत ऋतु में और फल ग्रीष्म के अंत तथा वर्षा के प्रारंभ में लगने शुरू हो जाते हैं।
(6)रासायनिक संघटन
नीम की छाल में निम्बिन, निम्बिडिन, उड़नशील तेल, निम्बिनिन, निम्बोस्टेरॉल, टैनिन, मार्गोसिन नामक तिक्त तत्व पाए जाते हैं। बीज के तेल में गंधक के यौगिक, सार, राल और वसा होती है।
(7)आयुर्वेदिक गुण-धर्म:
नीम का रस – तिक्त और कषाय,
नीम के गुण – लघु,
नीम का वीर्य – शीत और
नीम का विपाक – कटु है।
(8)दोषों पर प्रभाव:
नीम का जो रस है, वह तिक्त होने के कारण कफ और पित्त को शमन करने का काम करता है।
(9) मुख्य कर्म:
कृमिनाशक, वर्णशोधक, ज्वरनाशक, रक्तशोधक, कण्डूनाशक।
(10)प्रयोज्य अंग, मात्रा और विशिष्ट योग:
प्रयोज्य अंग: फल, छाल, गोंद, पत्ते और बीज का तेल।
मात्रा: छाल के चूर्ण की मात्रा 2 से 4 ग्राम, पत्तों के स्वरस की मात्रा 10 से 20 ml, तेल 5 से 10 बूंद।
विशिष्ट योग: निम्बादि तेल, हरिद्रा खंड, पंचनिम्ब चूर्ण, निम्बारिष्ट, निम्ब हरिद्रा खंड।
नीम के औषधीय गुण कौन से हैं in hindi
आयुर्वेद में नीम(Neem ke fayde in Hindi) को एक श्रेष्ठ औषधियों में से एक माना गया है। इसमें आचार्य चरक ने इसे कुष्ठघ्न और कंडूघ्न औषधियों में प्रमुख स्थान दिया।
- आयुर्वेद के अनुसार नीम का जो रस है, वो तिक्त और कषाय होता है। तिक्त रस होने के कारण यह हमारे शरीर में जमा हुए आम, विष और कफ को सुखाने का काम करता है। और कषाय रस होने के कारण यह घाव को भरने और रक्त को शुद्ध करने का काम भी करता है।जल्दी पचने वाला है।
- और इसका जो वीर्य है, शीत है। जैसा कि हमने ऊपर ये सब देखा, इसलिए वीर्य शीत होने के कारण यह पित्त से उत्पन्न होने वाली जलन, दाह और गर्मी को शांत करने का काम भी करता है। पाचन के बाद इसका जो विपाक है, वो कटु होता है, जिससे यह कफ को नियंत्रित करने का काम करता है।
- गुणों के आधार पर नीम के मुख्य औषधीय कर्म रक्त शोधक, कृमिनाशक, वर्ण शोधक, ज्वरनाशक और कुष्ठनाशक हैं, जैसा कि ये भी हमने ऊपर देखा।
- लेकिन आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी नीम में निम्बिन, निम्बिडिन जैसे तत्त्व पाए जाते हैं, जो कि एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगल और एंटीवायरल गुणों से भरपूर होते हैं। इसी कारण यह हमारे शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
- यह पित्त और कफ दोष का शमन करने के साथ वात प्रकृति वाले लोगों को इसका अधिक सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि तिक्त रस वात को बढ़ाता है।
- तो हम छोटे से रूप में ये कह सकते हैं कि नीम एक ऐसी औषधि है, जो अंदर से रक्त को साफ करती है और बाहर से त्वचा और घावों से रक्षा करती है।
नीम की पत्तियों के फायदे और नुकसान(Neem ke fayde in Hindi)नीम के 10 फायदे
नीम का पानी पीने के फायदे और तरीके
अगर रात में 10 से 15 नीम के पत्तों को एक गिलास पानी में भिगो दें और सुबह उस पानी को छानकर खाली पेट पिएँगे, तो इससे हमारे शरीर में रक्त जो है, वह शुद्ध होगा और पेट साफ रहेगा। त्वचा के रोग, जैसे मुहाँसे, कम होंगे। यह शरीर की गर्मी को शांत करता है और इम्यूनिटी को बढ़ाता है। मधुमेह के रोगियों के लिए भी यह लाभकारी रहता है।
लेकिन ध्यान रहे, इसका सेवन लगातार 15 दिन से अधिक नहीं करना चाहिए और न ही अधिक मात्रा में पीना चाहिए, क्योंकि इसका स्वभाव रूखा होता है। फिर भी अगर आपको इसको पीना है, तो आप एक चिकित्सक की सलाह से दीर्घ समय तक पी सकते हैं।
खाली पेट नीम खाने के फायदे
सुबह खाली पेट चार से पाँच कोमल नीम के पत्ते चबाकर खाने से हमारे शरीर में विषैले तत्व बाहर निकलते हैं। इससे रक्त शुद्ध होता है, जिससे चेहरा साफ होता है और फोड़े-फुंसी ठीक होते हैं। यह पेट के कीड़ों को नष्ट करता है और पाचन क्रिया को मजबूत भी बनाता है।
शुगर के रोगियों में यह शर्करा को नियंत्रित करने में मदद करता है। शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। इसे 10 से 15 दिन खाने के बाद बीच में कुछ अंतराल देना जरूरी है।
नीम के तेल के फायदे(Neem ke fayde in Hindi) त्वचा और बालों के लिए
नीम का तेल त्वचा और बालों के लिए वरदान है, क्योंकि त्वचा पर लगाने से खुजली, दाद, एक्जिमा और मुहाँसों से बहुत आराम मिलता है। अब आराम मिलने का कारण यह है कि इसमें जीवाणुनाशक गुण होते हैं।
यह घाव को जल्दी भरता है। बालों में लगाने से डैंड्रफ, जूँ और सिर की खुजली को भी दूर करता है। हफ्ते में दो बार नारियल तेल में पाँच से छह बूंद नीम का तेल मिलाकर मालिश करने पर फायदा रहता है।
ध्यान रहे, शुद्ध नीम के तेल को सीधा चेहरे पर नहीं लगाना चाहिए। हमेशा किसी अन्य तेल के साथ मिलाकर ही इसका प्रयोग करना चाहिए|
फायदे, दातुन और काढ़ानीम की छाल के
दोस्तों, नीम की छाल में कृमिनाशक और रक्तशोधन गुण होते हैं। इसकी दातुन करने से दांत मजबूत होते हैं, मसूड़ों से खून आना बंद हो जाता है और मुंह की बदबू दूर होती है। इसकी छाल का काढ़ा बनाकर पीने से बुखार, त्वचा के रोग और मधुमेह में लाभ मिलता है।
काढ़े के लिए 5 ग्राम छाल को 200 ml पानी में उबालकर 50 ml शेष रहने पर छान लें। इस काढ़े से घाव धोने से घाव भी जल्दी भरता है और संक्रमण भी नहीं होता है।
नीम और गिलोय का जूस एक साथ पीने के फायदे
नीम और गिलोय दोनों ही त्रिदोषनाशक हैं। दोनों का जूस एक साथ पीने से इम्युनिटी बहुत तेजी से बढ़ती है। यह बुखार, डेंगू के बाद की कमजोरी और पुराने त्वचा रोगों में लाभकारी माना जाता है। यह रक्त को शुद्ध करता है और प्लेटलेट्स बढ़ाने में मदद करता है।
10 ml नीम का रस और 10 ml गिलोय का रस 30 ml पानी में मिलाकर सुबह खाली पेट लेना चाहिए। यह शरीर की गर्मी और पित्त को शांत करता है और बार-बार होने वाले जो संक्रमण हैं, उनसे रक्षा करता है।
नीम के पत्ते का फेस पैक कैसे बनाएं?
मुंहासों और ऑयली स्किन के लिए नीम का फेस पैक उत्तम माना गया है। इसके लिए 15 से 20 नीम के पत्तों को पीसकर पेस्ट बना लें। इसमें एक चम्मच मुल्तानी मिट्टी और थोड़ा-सा गुलाब जल मिलाएं। इस पैक को साफ चेहरे पर 15 मिनट तक लगाकर रखें और फिर गुनगुने पानी से धो लें।
यह अतिरिक्त तेल को सोखता है, बैक्टीरिया को मारता है और दाग-धब्बों को कम करता है। हफ्ते में दो बार इसका प्रयोग करें। संवेदनशील त्वचा वाले लोग पहले थोड़ा-सा लगाकर जांच कर लें या फिर चिकित्सक से संपर्क करें।
शुगर में नीम का उपयोग कैसे करें?
जैसा कि हमने ऊपर बार-बार दो-तीन जगह पर देखा कि पत्ते शुगर में काम आते हैं, छाल का जो स्वरस बनता है, वह शुगर में काम आता है। तो मधुमेह में नीम सहायक औषधि के रूप में काम करती है। यह इंसुलिन की संवेदनशीलता को बढ़ाता है।
इसके लिए सुबह चार-पांच पत्ते चबाकर खाए जा सकते हैं या 10-15 पत्तों का काढ़ा बनाकर हम पी सकते हैं। नीम की छाल का चूर्ण 2 ग्राम सुबह-शाम गुनगुने पानी से लेना भी लाभकारी होता है। नीम की निंबोली के बीज का तेल भी शुगर में उपयोगी माना जाता है।
ध्यान रहे, यह दवा का विकल्प नहीं है। शुगर की दवा के साथ इसका प्रयोग करने से पहले हमें उचित चिकित्सक से सलाह लेनी है और शुगर की नियमित जांच करते रहना चाहिए।
नीम की निंबोली के फायदे
नीम के फल को निंबोली कहते हैं। इसके अंदर की गिरी और इससे निकला हुआ तेल बहुत ही गुणकारी माना गया है। निंबोली का तेल कृमिनाशक है और पेट के कीड़ों में दिया जाता है। इसकी खली खेतों में प्राकृतिक कीटनाशक और खाद के रूप में भी उपयोग में ली जाती है।
त्वचा रोगों में निंबोली के तेल की मालिश से भी लाभ मिलता है। बवासीर में भी इसका प्रयोग किया जाता है। पुराने समय में निंबोली को सुखाकर उसका चूर्ण बनाकर पुष्ट रोगियों में दिया जाता था। इसका तेल दीपक जलाने और साबुन बनाने में भी काम आता है।

नीम की पत्तियों के नुकसान या सावधानियां
- हर औषधि के फायदे होते हैं, तो इसका मतलब ये नहीं होता है कि उसमें सिर्फ फायदे ही हैं। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, तो उसी तरह औषधियों के कुछ नुकसान और सावधानियां भी होती हैं।
- नीम का स्वभाव शीत और रूक्ष होता है, इसलिए ये बहुत अधिक मात्रा में या लंबे समय तक खाने से हमारे शरीर में वात बढ़ा सकता है, जिससे जोड़ों के दर्द, कमजोरी या शरीर में रूखापन आ सकता है।
- और गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और अगर कोई दंपति गर्भधारण की योजना बना रहा है, तो इसका सेवन उचित चिकित्सक की सलाह के बिना नहीं करना चाहिए।
- छोटे बच्चों और अत्यधिक दुबले-पतले लोगों को भी इसका सेवन कम मात्रा में ही करना चाहिए या सीमित मात्रा में करना चाहिए।
- सही समय पर और उचित मात्रा में लिया गया नीम ही अमृत के समान काम करता है।
- कुल मिलाकर बात ऐसी है दोस्तों, उचित चिकित्सक की सलाह से ही हमें नीम का किसी भी तरह का सेवन, किसी भी रूप में करना चाहिए। बिना चिकित्सक की सलाह के इसका सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि अगर हम खुद से चिकित्सक बन जाएंगे, तो फिर मतलब ही नहीं रहा।
नीम से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – FAQ
(1) नीम का मुख्य उपयोग क्या है?
Ans.नीम को आयुर्वेद के अंदर सर्व रोग निवारणी कहा गया है। ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि इसका मुख्यतः उपयोग खून को शुद्ध करने, चर्म रोग, फोड़े-फुंसी, खुजली या जो हमारे फंगल इन्फेक्शन होते हैं और डायबिटीज को कंट्रोल करने में यह बहुत ही फायदेमंद आयुर्वेदिक औषधि है। यह शरीर के अंदर और बाहर, दोनों तरह से हमारी सफाई करती है।
(2) नीम के बारे में 5 लाइनें क्या हैं?
Ans.(1) नीम को आयुर्वेद में प्रकृति की फार्मेसी भी कह सकते हैं हम।
(2)इसकी पत्तियाँ, छाल, तेल, दातौन, सभी का औषधीय उपयोग है।
(3)यह एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगल और एंटीसेप्टिक गुणों से भरपूर औषधि के रूप में काम आती है।
(4)यह त्वचा को सुंदर और रक्त को शुद्ध बनाने का काम करती है, नीम।
(5)रोज अगर हम नीम का सेवन करेंगे तो इससे हमारी इम्यूनिटी मजबूत होगी।
(3) चर्म रोग में नीम का उपयोग कैसे करें?
Ans.नहाने के लिए 15 से 20 नीम की पत्तियों को पानी में उबाल लें, फिर उस पानी से नहाएँ।
लेप के लिए नीम की पत्तियों को अच्छे से पीसकर हल्दी के साथ एक पेस्ट बनाकर प्रभावित जगह पर 15 मिनट तक लगाएँ।
पीने के लिए सुबह खाली पेट 5 से 6 कोमल पत्तियाँ अगर हम चबाएँगे, इससे खून अंदर से हमारा साफ होगा।
(4) क्या नीम खुजली के लिए अच्छा है?
उत्तर:हाँ, यह खुजली के लिए बहुत अच्छी औषधि है। खुजली का जो मुख्य कारण है, वह बैक्टीरिया और फंगस होते हैं और नीम उनका सबसे बड़ा दुश्मन है। नीम के पानी से नहाने या फिर नीम का तेल लगाने से दो से तीन दिन में खुजली से आराम मिलने लगता है और दाग भी नहीं पड़ते हैं।
(5) नीम का पत्ता कब नहीं खाना चाहिए?
उत्तर: कुछ परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं, जिनमें नीम का पत्ता नहीं खाना चाहिए,
(1)जैसे गर्भवती महिलाएँ और जो दंपति संतान प्राप्ति की कोशिश कर रहे हैं,
(2)जिनका शुगर लेवल बहुत लो रहता है,
(3)छोटे बच्चे। पाँच साल से कम उम्र के बच्चों को ज्यादा मात्रा में नहीं देना चाहिए।
(4)बुखार या शरीर में कमजोरी जैसा अगर महसूस हो रहा है,
(5)या फिर शरीर में रूखापन ज्यादा है, तो इसका सेवन नहीं करना चाहिए।
(6) फंगल इन्फेक्शन के लिए नीम का उपयोग कैसे करें?
उत्तर: नीम की 20–25 पत्तियाँ और चार से पाँच लहसुन की कलियाँ पीसकर आपको पेस्ट बनाना है। इसमें दो चम्मच नारियल का तेल मिलाना है तथा साथ में ही इसको दिन में दो बार फंगल वाले स्थान पर लगाएंगे, तो सात दिन में फंगस सूखने लगेगा। साथ में नीम का काढ़ा पीने से इनफेक्शन जल्दी खत्म हो जाता है।
(7) खुजली के लिए नीम का तेल कैसे बनाएं?
उत्तर: दोस्तों, घर पर अगर आपको शुद्ध तेल बनाना है, तो उसके लिए कुछ स्टेप मैं आपको बता रहा हूँ। पहला, (1)100 ml सरसों या नारियल का तेल लें।
(2)उसमें एक मुट्ठी, लगभग 50 ग्राम, ताजी नीम की पत्तियाँ डालें।
(3)धीमी आँच पर तब तक पकाएँ, जब तक पत्तियाँ काली नहीं हो जाएँ। ठंडा करके छान लें। आपको जादुई नीम का तेल तैयार है। इसे काँच की बोतल में भरकर रख लें।
(8) नीम का तेल कहाँ लगाना चाहिए?
उत्तर: नीम का तेल सिर्फ प्रभावित जगह पर ही लगाना चाहिए, जैसे अगर आपको दाद, खाज, खुजली, फोड़े-फुंसी, कटे या जले हैं। इसे पूरे शरीर में कभी नहीं लगाएँ। चेहरे पर लगाना है, तो नारियल के तेल में दो से तीन बूंद मिलाकर ही लगाएँ। सीधा लगाने पर यह जलन जैसा महसूस हो सकता है।
(9) 1 दिन में कितनी नीम की पत्तियां खानी चाहिए?
एक स्वस्थ व्यक्ति को रोज सुबह खाली पेट 5 से 7 कोमल नई पत्तियाँ काफी हैं। पंद्रह दिन खाकर दस दिन का गैप हमें जरूर देना चाहिए, ताकि शरीर में गर्मी नहीं बढ़े। ऐसा भी है, तो आप चिकित्सक से सलाह लें।
(10)नीम की पत्ती कौन से महीने में खानी चाहिए?
आयुर्वेद के अनुसार चैत्र महीना होता है, जो सामान्यतः मार्च-अप्रैल में आता है। उसमें नीम खाने का सबसे उत्तम महीना है। इस महीने में नीम खाने से पूरे साल चर्म रोग और बुखार से बचाव होता है। वैसे आप सावन के बाद कोमल पत्तियाँ साल भर खा सकते हैं।
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NOTE: ये लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से है। किसी भी चिकित्सा हेतु अपने नजदीकी आयुर्वेद वैद्य से परामर्श ज़रूर करें। अपने खुद से डॉक्टर या चिकित्सक नहीं बनें।
✍️ Lekhak: Ayurved Study Hub Research Team
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📖 Reference: Charak Samhita, Bhavprakash Nighantu
⚠️ Disclaimer: Yah lekh keval shiksha ke liye hai. Kisi bhi aushadhi ka sevan karne se pehle apne Vaidya se paramarsh jarur le.
